Jab zid pe aa gayi parvati parvati parvati
Samjhane pahunche saptarishi saptarishi saptarishi
Kaay zid kar rahi kaay ko mar rahi
Kaay zid kar rahi kaay ko mar rahi aise var ke laane
Kaay zid kar rahi kaay ko mar rahi aise var ke laane
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Itne seedhe-saadhe hain sab kehte bholenath bholenath
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Itne seedhe-saadhe hain sab kehte bholenat...
Na khapra na chhapra na foos ki dhare madhiya
Ka khave ko dharo wahaan bas rovat rahat ladiya
Na khapra na chhapra na foos ki dhare madhiya
Ka khave ko dharo wahaan bas rovat rahat ladiya
Bhesh dhare avdhoot phire ab tumse ka kahe binnu
Dora dangar le ghumein ve inke kachhue naiyaan
Kaay zid kar rahi kaay ko mar rahi
Kaay zid kar rahi kaay ko mar rahi aise var ke laane
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe sa..
Itne seedhe-saadhe hain sab kehte bholenath bholenath
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Itne seedhe-saadhe hain sab kehte bholenath bholenath
Jata lata na kabhun sanvaare deesat maha bhayankar
Moor pe aadho chanda aur bela pe ghume shankar
Jata lata na kabhun sanvaare deesat maha bhayankar
Moor pe aadho chanda aur bela pe ghume shankar...
Ram naam ke rasiya hain ve aur unhein kya chahne
Kaamdev ke mardanhaari ghar-grihasti kya jaane
Are ghar-grihasti kya jaane
Kaay zid kar rahi kaay tap kar rahi
Kaay zid kar rahi kaay tap kar rahi aise var ke laane
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Itne seedhe-saadhe hain sab kehte bholenath bholenath
Jaake sees pe ganga aur gale mein daale phir rahe saanp
Itne seedhe-saadhe hain sab kehte bholenath bholenath...
Lyrics Meaning In Hindi
यह गीत माता पार्वती की भगवान शिव को पति रूप में पाने की ज़िद और तपस्या को लोकगीत के मज़ेदार, घरेलू और चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें सप्तर्षि पार्वती को समझाते हैं कि शिव जैसे वर को क्यों चुन रही हो, और पार्वती के सामने शिव के रूप, रहन-सहन और स्वभाव की खूबियाँ/अजीबियाँ गिनाते हैं।
नीचे आपके दिए हुए पूरे गीत का पंक्ति-दर-पंक्ति सरल हिंदी अर्थ है।
1. “जब ज़िद पे आ गई पार्वती…”
“जब ज़िद पे आ गई पार्वती…”
अर्थ: माता पार्वती ने ठान लिया है कि उन्हें भगवान शिव को ही पति के रूप में पाना है। उनकी इच्छा इतनी दृढ़ है कि वे किसी दूसरे वर के बारे में सोचने को तैयार नहीं हैं।
“समझाने पहुँचे सप्तऋषि…”
अर्थ: पार्वती को समझाने के लिए सप्तऋषि उनके पास आते हैं। वे उन्हें समझाते हैं कि शिव को पति बनाने का विचार छोड़ दो और कोई दूसरा, अधिक सामान्य और गृहस्थ जीवन के योग्य वर चुनो।
“काय ज़िद कर रही, काय को मर रही, ऐसे वर के लाने”
यह बुंदेली/लोकभाषा का भाव है।
अर्थ: “तुम ऐसी ज़िद क्यों कर रही हो? ऐसे वर को पाने के लिए इतना कष्ट और तपस्या क्यों कर रही हो?”
सप्तऋषियों को लगता है कि पार्वती शिव के कठिन और असामान्य जीवन को देखकर शायद अपना निर्णय बदल देंगी।
2. शिव के सिर पर गंगा और गले में साँप
“जाके सीस पे गंगा और गले में डाले फिर रहे साँप”
अर्थ: शिव के सिर पर माँ गंगा विराजमान हैं और उनके गले में साँप लिपटा रहता है।
सप्तऋषि इसे एक सामान्य वर के दृष्टिकोण से देखकर कहते हैं कि भला ऐसा व्यक्ति गृहस्थ जीवन के लिए कैसा रहेगा?
यहाँ गीत में हास्य और लोकगीत वाली छेड़छाड़ है। शिव के दिव्य स्वरूप को एक साधारण लड़की के परिवार की नज़र से देखा गया है।
“इतने सीधे-साधे हैं, सब कहते भोलेनाथ…”
अर्थ: फिर भी भगवान शिव को लोग भोलेनाथ कहते हैं, क्योंकि वे बहुत सरल, भोले और निष्कपट माने जाते हैं।
यहाँ एक सुंदर विरोधाभास है—
बाहर से शिव का रूप भयंकर और विचित्र दिखाई देता है, लेकिन स्वभाव से वे बहुत सरल और दयालु हैं।
3. शिव के पास घर-गृहस्थी जैसी कोई सुविधा नहीं
“ना खपरा, ना छपरा, ना फूस की धरे मड़िया”
यह लोकभाषा में शिव के साधु-संन्यासी जीवन का वर्णन है।
अर्थ: उनके पास न कोई पक्का घर है, न छप्पर वाला घर और न ही सामान्य गृहस्थ की तरह रहने की व्यवस्था।
“मड़िया” का अर्थ यहाँ छोटी-सी झोपड़ी/रहने की जगह के भाव में है।
सप्तऋषि मानो कह रहे हैं—
“तुम जिस वर को चुन रही हो, उसके पास रहने के लिए सामान्य घर तक नहीं है!”
“का खावे, को धरो वहाँ, बस रोवत राहत लइया”
भावार्थ: वहाँ खाने-पीने और सुख-सुविधाओं का क्या ठिकाना होगा? वहाँ तो कठिन जीवन है और तुम्हें परेशानियाँ ही मिलेंगी।
अर्थात सप्तऋषि पार्वती को डराते हैं कि शिव के साथ विवाह करके तुम्हें राजकुमारी जैसा सुख नहीं मिलेगा।
4. शिव का साधु वाला वेश
“भेष धरे अवधूत फिरे, अब तुमसे का कहें बिन्नू”
अवधूत यानी ऐसा योगी/साधु जो सांसारिक बंधनों और दिखावे से दूर हो।
अर्थ: शिव साधु और अवधूत का वेश धारण करके घूमते रहते हैं। अब तुम्हें और क्या समझाएँ?
सप्तऋषियों का तर्क है कि पार्वती को एक ऐसे पति की आवश्यकता है जो सामान्य गृहस्थ की तरह रहे, जबकि शिव तो योगी और विरक्त हैं।
“डोरा डंगर ले घुमें, वे इनके कछुए नैयाँ”
यह पंक्ति लोकभाषा/पाठांतर के कारण थोड़ी अस्पष्ट है, लेकिन संदर्भ में भाव यही है कि शिव का रहन-सहन और साथ रहने वाला संसार सामान्य गृहस्थों से बिल्कुल अलग है।
अर्थ: उनके जीवन में सांसारिक वैभव और सामान्य गृहस्थी की व्यवस्था नहीं है।
5. फिर वही सवाल—तुम शिव को ही क्यों चाहती हो?
“काय ज़िद कर रही, काय को मर रही, ऐसे वर के लाने”
अर्थ:
“ऐसे वर को पाने के लिए तुम इतनी ज़िद और तपस्या क्यों कर रही हो?”
सप्तऋषि पार्वती को समझाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन पार्वती का प्रेम और संकल्प इतना मजबूत है कि वे किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हैं।
6. शिव के साँप और गंगा का दोबारा उल्लेख
गीत में फिर आता है:
“जाके सीस पे गंगा और गले में डाले फिर रहे साँप…”
यह दोहराव केवल गीत की लय के लिए नहीं है। यह शिव के असामान्य रूप को बार-बार सामने रखता है।
सिर पर गंगा, गले में नाग, शरीर पर भस्म, जटाएँ—ये सब शिव की पहचान हैं।
फिर:
“इतने सीधे-साधे हैं, सब कहते भोलेनाथ…”
अर्थ: इन सभी विचित्र प्रतीकों के बावजूद शिव का हृदय अत्यंत सरल है। इसी कारण उनका नाम भोलेनाथ पड़ा।
7. शिव की जटाएँ और भयंकर रूप
“जटा-लता ना कबहुँ सँवारे, दीसत महा भयंकर”
अर्थ: शिव अपनी लंबी जटाओं को किसी सामान्य व्यक्ति की तरह सँवारते नहीं हैं। उनकी जटाएँ बिखरी हुई हैं और उनका रूप देखने में बहुत भयंकर दिखाई देता है।
यहाँ फिर लोकगीत का हास्य है।
एक तरफ पार्वती के लिए शिव परमेश्वर हैं, लेकिन सप्तऋषि उन्हें ऐसे दिखा रहे हैं जैसे कोई लड़की बहुत अजीब वेशभूषा वाले व्यक्ति से विवाह करने जा रही हो।
8. सिर पर आधा चंद्रमा
“मूर पे आधो चंदा और बेला पे घुमें शंकर”
“मूर” यानी सिर।
अर्थ: शिव के सिर पर आधा चंद्रमा सुशोभित है और वे संसार में अपने अनोखे रूप में विचरण करते हैं।
यह वास्तव में भगवान शिव के चंद्रशेखर/सोमेश्वर स्वरूप की ओर संकेत है।
शिव के सिर पर चंद्रमा का होना उनके दिव्य स्वरूप और समय/चक्र पर नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।
9. शिव राम नाम के भक्त हैं
“राम नाम के रसिया हैं वे, और उन्हें क्या चाहने”
अर्थ: भगवान शिव को राम नाम अत्यंत प्रिय है। वे भक्ति और आध्यात्मिकता में लीन रहने वाले हैं।
यहाँ गीत बताता है कि शिव की रुचि सांसारिक सुखों में नहीं, बल्कि ईश्वर-भक्ति और आध्यात्मिक जीवन में है।
10. कामदेव को पराजित करने वाले शिव
“कामदेव के मर्दनहारी, घर-गृहस्थी क्या जाने”
कामदेव प्रेम और कामना के देवता माने जाते हैं।
शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से भस्म किया था। इसलिए उन्हें कामांतक/कामदहन करने वाला कहा जाता है।
सप्तऋषि इसी बात को मज़ाकिया ढंग से इस्तेमाल करते हुए कहते हैं:
“जिसने कामदेव को ही भस्म कर दिया, वह भला गृहस्थ जीवन क्या जानेगा?”
यहाँ उनका उद्देश्य पार्वती को शिव से दूर करना है।
11. “घर-गृहस्थी क्या जाने”
“अरे घर-गृहस्थी क्या जाने…”
अर्थ: शिव तो योगी हैं, संसार से विरक्त हैं। उन्हें सामान्य पति की तरह घर चलाना, सांसारिक सुख-सुविधाएँ और गृहस्थ जीवन कहाँ पसंद होगा?
सप्तऋषियों के अनुसार पार्वती को ऐसे व्यक्ति से विवाह करना चाहिए जो सामान्य गृहस्थ जीवन जी सके।
लेकिन यही बात गीत का मज़ेदार विरोधाभास बन जाती है—क्योंकि बाद में शिव और पार्वती का विवाह आदर्श दांपत्य और शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक बनता है।
12. “काय ज़िद कर रही, काय तप कर रही…”
“काय ज़िद कर रही, काय तप कर रही, ऐसे वर के लाने”
अर्थ:
“तुम ऐसे वर को पाने के लिए इतनी ज़िद क्यों कर रही हो और इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हो?”
यहाँ तपस्या का विशेष महत्व है।
पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। उनका संकल्प केवल आकर्षण या सामान्य विवाह की इच्छा नहीं था, बल्कि अटूट भक्ति और प्रेम था।
गीत का असली भाव
पूरे गीत को केवल यह समझना कि सप्तऋषि शिव की बुराई कर रहे हैं, अधूरा होगा।
असल में गीत में एक बहुत सुंदर लोक-हास्य और आध्यात्मिक संदेश छिपा है।
सप्तऋषि शिव के बाहरी रूप को देखकर बातें गिनाते हैं:
- सिर पर गंगा
- गले में साँप
- जटाएँ
- भस्म और साधु का रूप
- घर-गृहस्थी की चिंता नहीं
- कोई राजसी ठाठ-बाट नहीं
- कामदेव को भी भस्म करने वाले
- हमेशा योग और भक्ति में लीन
वे पार्वती से कहते हैं कि “ऐसे वर को क्यों चुन रही हो?”
लेकिन पार्वती जानती हैं कि शिव का वास्तविक स्वरूप उनके बाहरी रूप से कहीं अधिक महान है।
पार्वती की दृष्टि से शिव कौन हैं?
सप्तऋषियों की दृष्टि में:
शिव = अजीब वेश वाला, घर-संसार से दूर रहने वाला योगी।
लेकिन पार्वती की दृष्टि में:
शिव = परमेश्वर, सरल हृदय, त्यागी, करुणामय और उनके जीवन के परम साथी।
यही इस लोकगीत की सबसे खूबसूरत बात है।
दुनिया शिव के बाहरी रूप को देखकर उन्हें “भयंकर” समझती है, जबकि पार्वती उनके भीतर के भोलेपन और दिव्यता को पहचानती हैं।
“भोलेनाथ” शब्द का विशेष अर्थ
गीत में बार-बार आने वाला “भोलेनाथ” बहुत महत्वपूर्ण है।
“भोला” केवल मासूम या सीधा-सादा होने के अर्थ में नहीं है। शिव को भोलेनाथ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे निष्कपट, शीघ्र प्रसन्न होने वाले और भक्तों पर कृपा करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
इसलिए गीत का एक सुंदर विरोधाभास है:
रूप — भयंकर
जीवन — विरक्त
वेश — साधु का
गले में — साँप
सिर पर — गंगा और चंद्रमा
हृदय — भोला और करुणामय
पूरे गीत का सरल सार
अगर पूरे गीत को एक छोटी कहानी की तरह समझें, तो भाव यह है:
पार्वती ने निश्चय कर लिया है कि वे भगवान शिव को ही पति बनाएँगी। सप्तर्षि उन्हें समझाने आते हैं। वे शिव के विचित्र रूप और साधु जीवन की सारी कमियाँ गिनाते हैं—उनके सिर पर गंगा है, गले में साँप है, जटाएँ बिखरी रहती हैं, कोई महल या सुख-सुविधा नहीं है और वे गृहस्थ जीवन से विरक्त हैं। इसलिए सप्तर्षि कहते हैं कि पार्वती ऐसी ज़िद क्यों कर रही हैं और ऐसे वर के लिए इतनी तपस्या क्यों कर रही हैं।
लेकिन पार्वती का संकल्प अडिग है। वे शिव के बाहरी रूप या सांसारिक संपत्ति को नहीं देखतीं। वे शिव के वास्तविक स्वरूप, उनकी सरलता, भक्ति, त्याग और दिव्यता को पहचानती हैं। इसलिए गीत में हास्य के माध्यम से अंततः यह भाव उभरता है कि सच्चा प्रेम बाहरी रूप और धन-दौलत नहीं, बल्कि व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप को देखता है।
एक पंक्ति में भाव
“सप्तर्षि शिव के बाहरी रूप और विरक्त जीवन को देखकर पार्वती को रोकते हैं, लेकिन पार्वती जानती हैं कि भयंकर दिखने वाले शिव ही भीतर से सबसे भोले और दिव्य हैं।”
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